लोक- आस्था

लोक- आस्था:-जब किसी धार्मिक विश्वास या परंपरा को समाज के बड़े हिस्से द्वारा बिना किसी भारी-भरकम कर्मकांड के, सहज रूप से अपनाया जाता है और उसे पीढ़ी-दर-पीढ़ी निभाया जाता है, तो वह ‘लोक आस्था’ कहलाती है।

लोक आस्था में निम्न बिन्दु आवश्यक होते हैं।विश्वास, श्रद्धा, निष्ठा, भरोसा, यकीन, किसी के प्रति अटूट निष्ठा।आदि।
लोक में एक बडे वर्ग,सामाजिक संरचना,सामाजिक बडी इकाई के द्वारा उपर्युक्त बिन्दु बिना किसी तर्क के स्वीकार किए जाते हैं,इस आस्था को तोड पाना किसी के वश की बात नहीं है।ये तर्कातीत होते हैं। जब एक सम्पूर्ण सामाजिक वर्ग इस आस्था का अनुपालन,अनुसरण सामूहिक रूप से करने लगता है,तब यह आस्था का महापर्व कहलाता है। इस महापर्व में किसी पुरोहित की कोई आवश्यकता नहीं पडती है,न किसी मंत्रादि, की आवश्यकता होती है।इसकी एक सुदीर्घ परम्परागत पनपती है,और उसका उत्स खोज पाना बहुत कठिन हो जाता है।

लोक- आस्था का सामाजिक-आर्थिक महत्व :-
1-लोक आस्था से सामाजिक समेकन( Social Integration,Inclusion) सरलता और सहजता से हो जाता है,इसका लिघटन करना नितान्त कठिन होता है।
2- लोक- आस्था सामाजिक- मनोविज्ञान( Socio- Psychology) के अन्तर्गत मनोचिकित्सा का सबसे सरल,सहज,सुलभ साधन होता है। इसकी एक सुदृढ परम्परा होती है,जो पीढी दर पीढी स्थानान्तरित होती रहती है।
3 जब लोक- आस्था का महापर्व होता है तब पूजा अर्चन,के लिए सामान की बिक्री – खरीद होती है, जिससे अल्पकालीन रोजगार के अवसर मिलते हैं।
4- लोक- आस्था सामाजिक सह- सम्बन्धों का विकास करती है,जिससे सामाजिक सम्बन्ध प्रगाढ होते हैं
5- लोक- आस्था नैतिक मूल्यों ( Moral values) के हस्तांतरण का सहज और सुलभ साधन है।
6- लोक- आस्था पर वाह्य प्रभाव न्यून पडता है।

विशेष :- लोक विश्वास में प्रगाढता, समर्पण,स्वीकृति,आदि तत्वों का मिश्रण होता है और उनका कडाई से पालन किया जाता है।
लोक- आस्था का महापर्व का सबसे सरल उदाहरण- भोजपुरी अंचल की छठी मैया का पर्व है जो विदेशों अप्रवासी पूर्वांचल का लोक जनमानस मनाता है।
कनउजी के लोक क्षेत्र में नवरात्र का पर्व , शीतला मइया,फूलमती मइया का उपवास ,फर्रुखाबाद पाञ्चाल घाट रामनगरिया का कल्पवास, आदि लोक- आस्था के पर्व कहे जा सकते हैं।

आइए इनको सहेजें।

डाॅ बीरेन्द्र कुमार चन्द्रसखी
मैंनपुरी