लोकगाथा का प्रयोग आंग्ल के बैलेड( Ballad) शब्द के पर्यायवाची के रूप में भारतीय परिवेश में लोक साहित्य के विद्वानों ने प्रयोग किया है। अत: पाश्चात्य विद्वानों ने इसके विषय में जो विचार रखे उनका अनुसरण करना आवश्यक हो जाता है। यह मूल रूप से गायन और नृत्य से सम्बन्धित है।इसके सूत्र भारतीय इतिहास में वैदिक काल में गाथिन् नाम से मिलते हैं।पालि साहित्य में गाथा का प्रयोग छन्दात्मक रचना के लिए प्रयोग हुआ है।चौथी – पांचवीं ईसा पूर्व में ये प्रबन्ध काव्य के रूप में विकसित हो गयी थीं।गाथा- सप्त- शती से यह ज्ञात होता है कि भारतीय लोक में गाथाओं की समृद्ध परम्परा विकसित हो गयी थी।डा० शम्भूनाथ सिंह,डा० कृष्णदेव उपाध्याय, डा० कुन्दन लाल उप्रेती, आदि विद्वान लोक गाथा को “साहित्यिक प्रभावों से मुक्त,एक ही जाति परम्परा से मौखिक रूप में प्रतिष्ठित किया हुआ मानते हैं।”आचार्य रामचन्द्र शुक्ल इसे वीर गीत मानते हैं। डा ०सत्येंद्र इसे ‘साका’ नाम देते हैं ,जो शायद आंग्ल के (SAGA) का हिन्दीकरण है। पाश्चात्य विद्वानों ए ०डब्ल्यू० श्लेगल का व्यक्तिवाद, चाइल्ड का व्यक्तिवाद विहीन व्यक्तिवाद,ग्रिम का लोक निमित्तवाद, गूमर का समुदायवाद,स्टेंथल का जातिवाद, विशप पर्सि का चारवाद ,आदि ने लोकगाथा के लिए विचार दिए हैं।
कन्नौज ( कनउजी) के क्षेत्र में लोकगाथा १० विशेषताओं के आधार पर मिलतीं हैं,जो हिन्दी साहित्य के वृहद इतिहास के आधार पर पाईं गयीं हैं। इनमें रचयिता का अज्ञात होना, प्रमाणिक मूल पाठ का अभाव, लम्बे कथानक की प्रधानता, टेक पदों की पुनरावृत्ति होती है।
लोक – गाथा गेय होतीं हैं। कुछ लोक- गाथाएं चम्पू काव्य( काव्य- गद्य मिश्रित) होतीं है।
लोक- गाथा को पंवारा- पंवाड़ा भी कहा गया है। पंवाड़ा का अर्थ ब्रजभाषा में झगड़ होता है। लेकिन कनउजी में इसका अर्थ आस्था और ओज- शौर्य दोनों से लगाया जाता हैं।इस क्षेत्र में ऊभदेव का गौना, और घन्नइया प्रसिद्ध लोक- गाथाएं हैं। सबसे प्रसिद्ध लोक – गाथा पंवाड़ा आल्हा है। यह कनउजी क्षेत्र की सर्वमान्य लोक- गाथा है। ये लोक- गाथाएं निजंधरी, प्राचीनतम् लोकगाथा, कौटुम्बिक , कारुणिक सीमान्त आरण्यक लोक- गाथाएं होतीं हैं। ये समस्त गूमर के अनुसार हैं।
सन् १८६० के आस- पास सर चार्ल्स इलियट ने फर्रुखाबाद – इटावा के क्रमश: विष्णु स्वरूप भटनागर,एवं इटावा के टीकाराम लुहन्ना आदि के माध्यम से आल्हा गायकों इकट्ठा करके आल्हा का संग्रहण करवाया व आंग्ल में अनुवाद किया जिसे ब्रिटेन भेजा गया, एवं कनउजी मिश्रित भाषा में प्रकाशित भी करवाया जो ५२ गढ़ की लड़ाइयों के रूप में आज भी हमारे समक्ष हैं। आइए कनउजी लोक- गाथाओं का संरक्षण करें।
आल्हा शिष्ट साहित्य में वीर- छन्द होता है, जो १६-१५ की यति पर रचा जाता हैं। फर्रुखाबाद के विष्णु स्वरूप भटनागर के इस संग्रह का प्रकाशन संवत १९२८ में हो गया था।
धिक हइ धिक हइ तबला बोलइ,खांउ- खांउ करत सरंगी जाय।
किनकौं- किनकौं करइ मंजीरा गिनि- गिनि सुबिया रही बताय।।
स्वरचित पंक्तियां ——————
लोक- कथा:- लोक- कथा शुद्ध रूप से औत्सुक्य नामक मनोभाव ( मानवीय – भाव) को तृप्त करने का सहज और सरल साधन है।आदिम मानस भी औत्सुक्य और विस्मय के भाव को परितृप्त करने के लिए भी इसी प्रकार के साधनों का उपयोग करता होगा।बालमन में भी इसी प्रकार की उत्सुकता ” उसके बाद, तब क्या हुआ होगा?” के क्रम में लोक- कथा की परिणिति होती है और लोक- कथा आगे सुनने का रुझान उत्पन्न होता है। भारतीय समाज में लोक- कथाओं का प्रचलन वैदिक साहित्य से ही शिष्ट साहित्य और धार्मिक साहित्य के रूप में अस्तित्व में आया।ऋग्वेद में यम- यमी का संवाद, पुरूरवा -उर्वशी, आदि प्राचीनतम रूप हमारे समक्ष आते हैं। इसके बाद शतपथ- ब्राह्मण इस दृष्टि से महत्वपूर्ण है। संस्कृत साहित्य में दो धाराएं प्राप्त होती हैं।ललित साहित्यिक कथाएं और धार्मिक कथाएं। बौद्ध धर्म की जातक कथाएं भी महत्वपूर्ण भूमिका निभातीं हैं। महायान सम्प्रदाय में लोक कथाओं का विशाल भण्डार है।
लोक- कथाओं का वर्गीकरण:- लोक- कथाएं प्राचीन काल से लोक साहित्य व शिष्ट साहित्य में सुरक्षित चलीं आई हैं। लोक- कथाओं के सूत्रों को कथा सरित्सागर, जातक कथाओं, पौराणिक कथाओं में सहजता से ढूंढा जा सकता है। ये अधिकतर मिथ्( Myth) मिथकों पर आधारित होते हैं। कैसरर(Cassierer) महोदय अनुभूति को महत्व देते हैं।”The realm substratum of Myth is not a substratum of thought but of feelings”. कुछ विद्वान इससे सहमत नहीं होते हैं। लोक- कथाएं मूल प्रवृत्ति व मिथ् का मिश्रित रूप हैं।
१- निजंधरी लोक- कथाएं
२- परीकथाएं
३ पशु पक्षी सम्बन्धी लोक- कथाएं ४ व्रत कथाएं,
५मनोरंजक कहानियां।
लोक साहित्यिक दृष्टि से इनका वर्गीकरण भी हुआ है। विशेषकर कनउजी क्षेत्र की लोक कथाओं को वर्गीकृत किया गया है। डा संतराम अनिल ने इन्हें वर्गीकृत किया है।
1-व्रत कथाएं ( सकट चौथ,जगन्नाथ सामी,करवा चौथ,अनन्त चौदस,भैया दूज, दिवारी की कथा)
2-उपदेशात्मक कथाएं नारद को घमंड दूरि करिबो,
3-प्रेम कथाएं, पंचतंत्र शैली, जाति स्वभाव वाली कथाएं।
अतः लोक कथाओं को लोक चेतना को जाग्रत करने और सामाजिक विन्यास,मनस् के तोष के लिए प्रयोग की जातीं हैं।
लोक कथाओं की विशेषताएं:- डाॅ कृष्णदेव उपाध्याय ने लोक कथाओं की विशेषताएं अधोलिखित बताईं हैं।१ प्रेम का अभिन्न पुट,
२ अश्लील श्रंगार का अभाव,
३ मानव की मूल प्रवृत्तियों से लगातार साहचर्य,
४ मंगल कामना की भावना,
५ संयोग में कथा का अन्त,
६ अलौकिकता,रहस्य- रोमांच की प्रधानता,
७ औत्सुक्य की भावना,
८ वर्णन की स्वाभाविकता।
लोक- कथाओं के कुछ सिद्धांत :- डाॅ कुन्दन लाल उप्रेती के द्वारा:-
१ प्रसारवाद,२ प्रतीकवाद
,३ मनोवैज्ञानिक दृष्टि,
४ व्याख्यावाद,५ विकासवाद,
६ यथार्थवाद,।
लगभग ये समस्त विशेषताएं कनउजी क्षेत्र की लोक- कथाओं में पाई जातीं हैं।
विशेष :- लोक- कथाओं के सर्वेक्षण की अवधि में ये तथ्य निकलकर आए कि कनउजी लोक- कथाओं को पंचतंत्र की अनुकृति पर अधिक कहा गया था ,निजंधरों पर आधारित भी लोक- कथाएं मिलतीं हैं।
सियार और ऊंट, लोमड़ी,शेर, सियार की लोक- कथा, जाति पर आधारित लोक कथा पांडे- पडियाइन, नाऊ- पंडित की लोक कथाएं प्रचलित थीं ,अब तो किसी को समय ही नहीं है,जो इन लोक- कथाओं को कहें और सुनें। आवश्यकता है इन्हें सहेजने की,आइए इस थाती को सहेजकर आगामी पीढ़ी तक स्थानान्तरण करें।।
डाॅ बीरेंद्र कुमार चन्द्रसखी
मैंनपुरी उ .प्र.
