कनउजी भाखा के लएं एकु अइसी साइट जासइ नयी पिढी को सुआभिमान जागि सकइ।

अपईं भाखा के लएं ,मिलि कें करियो काम।
जा बिधि सइ जा बढि सकइ ,सबइ मिलइ आराम।
सबइ मिलइ आराम,सबइ पहिचान बनाबउ।
सूखी रोटी खाइ, इसइ हर घर पहुंचाबउ।
“चन्द्रसखी ” कथि कहइं सुनउ हो ठाकुर मन के।
बिन पहिचान न होइ, रहउ नहिं काऊ घर के।

दोहा:- हर्षवर्धन महाराज नइं, कद्दओ सीदो काम।

मन्दिर, बउध विहार  रचि, सबइ मिलो आराम।

ललितादित्य महाराज नइं,जीती कनउज आइ।

यशोवरमन  झुकि  गए,तबहिं अउसर  पाइ।

नागवंस के राज मइं, खुसी हते सब लोग।

धन्य धन्य कनवज धरनि, मिट गए सबरे सोग।

चन्द्रसखी के करम हइं,भगति भजन अउ गान।

जासइ  सुख मिलिअइ सबइ,अउर मिलइ सनमान।

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