लोक विश्वास

 

   

भोरए की जथाजोग राम- राम।

लोकविश्वास:- यदि मानवीय मनस् किसी भी वस्तु,विचार,,दर्शन,कर्म आदि को एकाग्र मन से मानकर दिन प्रतिदिन उसे आचरण में लाता है,वह शनैः- शनैः विश्वास में बदलने लगता है,यह सदियों में घटित होता है। इसी प्रकार लोक मनस् भी किसी वस्तु,विचार,,दर्शन,कर्म को दीर्घकालीन अवधि तक एकाग्र मन से मानकर दिन प्रतिदिन आचरण में लाता है,वह लोक विश्वास में परिवर्तन हो जाता है। लोक-जीवन में यह व्यवहार में दिखाई पड जाता है,लोकविश्वास बहुत ही प्रगाढता से अपनी जडें लोक- सामाजिक व्यवस्था में जमाता है,इसे तोड़ पाना किसी भी सामाजिक कार्यकर्ता,समाज- मनोवैज्ञानिक का प्रयास तब तक विफल रहता है जब तक कोई दूसरा प्रतिस्थापन न दे दिया जाए। यह भी दीर्घकालीन अवधि का कार्य है। बहुत से आदिवासी समाजों यही हुआ है,कनउजी क्षेत्र के लोकजीवन में भी कई दशकों बाद लोकविश्वास को टूटते देखा गया है। जिससे भारतीय विशुद्ध लोकविश्वास जिस पर लोक मनोवैज्ञानिक अध्ययन कर रहे थे आश्चर्य में पड़ गये। साम्यवाद,समाजवाद,एकेश्वरवाद, ईशुवाद, इस्लामी एकेश्वरवाद, अनीश्वरवाद,इन समस्त वादों को लोकमानस तभी स्वीकार कर पाया जब दशकों से लोकमानस के विश्वास को कमतर निम्न बताकर नया विश्वास उत्पन्न हुआ। लोकविश्वास तभी स्थाई रह पाता है जब उस क्षेत्र विशेष के लोकजीवन पर बाह्य आक्षेप न हो।बाह्य आक्षेप के पडते ही लोक विश्वास टूट जाता है। कनउजी क्षेत्र में विभिन्न राजनैतिक दर्शनों का प्रभाव, कनउजी क्षेत्र लोक जीवन के लोक विश्वास को तोड़कर हुआ है। अतः लोक साहित्य के अध्येताओं को इस पर बहुत सावधानी से कार्य करना चाहिए। लोक विश्वास पर कार्य करने में अतिशय आनन्द आता है।

डाॅ बीरेंद्र कुमार चन्द्रसखी मैंनपुरी उ .प्र.