दोहा:- कानपुर के पास में नगर बिठूर सरनाम। नाना जी के महल में, था मैंना सुन्दर नाम।।
चौबोला:- मैना सुन्दर नाम,नाना जी की बेटी प्यारी।थी वह गुणों की खान लगे मैना की सूरत न्यारी।
ओजस्विता से दीप्त मुखड़ा देश प्रेम चिनगारी।ग्यारह सरस की कन्या सुकोमल थी मैना सुकुमारी।
दौड़:- नाना की बेटी जानो।हृदय की धड़कन मानो। लगे हैं सूरत प्यारी।
चन्द्रसखी सन् सत्तावन की धधकी वह चिनगारी।
क़व्वाली:- कानपुर से उस नंगर में,आउट्रम अफसर आया था।
बड़ा ही जालिम वह अफसर,प्रभू का न खौफ खाता था।
फौज का वह था दीवाना,जुल्म रह रह के करता था।लगे कोई बसर ऐसा उसी का काल आया था।
अगर आजादी के दीवाने,कभी नारे लगाते थे।समझ लो उन दीवानों का बड़ा शैतान आया था।
बहरतबील:- कैसी बातें करो पागलौं की तरह, । दिल में रखिए अपने लिए कुछ रहम।
छोड़कर यह बिठूर हम जाएं नहीं,छोड़ेंगे ही नहीं ये प्यारा हरम।।
आज आया है अचरज ख्याल ऐसा क्यों? । छोड़कर बिठूर क्यों बिगाड़ें धरम। । हम न छोड़ेंगे अपना प्यारा नगर, मत पालो आप मन में ऐसा भरम।
इसकी सम्पूर्ण पट कथा का प्रदर्शन दिनांक २३ जनवरी २०२७ को दिल्ली के नेताजी सुभाष प्लेस पर नेताजी सुभाष चंद्र बोस की १२९ वीं जयंती पर हुआ है।
रचनाकार
डाॅ बीरेंद्र कुमार चन्द्रसखी
मयनपुरी उ प्र।
