लोक साहित्य में आने वाली विधा इसके लोकगीत हैं,ये लोकगीत स्वस्फूर्त और स्वतंत्र रूप से गेय होते हैं,उन लोक गीतों की लय,धुन परम्परागत रूप से निश्चित होती है।लोकगीतों में (रंगतें, रागों के सुर,रागांश) प्राकृतिक रूप से पाए जाते हैं। ये सुनने में बहुत कर्णप्रियता लिए हुए होते हैं। कनउजी क्षेत्र में ऐसी बहुत सी रंगतें हैं जो आज स्वतंत्र रूप से रागात्मकता लिए हुए हैं। लोक साहित्य के अन्तर्गत आने वाली विधा लोक गीत से संगीत शास्त्रियों को कच्चा माल उपलब्ध होता है। संगीत का आधार स्वर,और निश्चित आरोहावरोह है,नियम हैं। संगीत निजी अभिव्यक्ति के लिए एक ऐसी सहजवृत्यात्मक स्वतन्त्रता की मांग करता है, जो शिष्ट समाज में संकोच और अनुशासन के कारण दबी रहती है। लोक में यह सहजवृत्ति प्रबल और स्वतंत्र होती है।अत: संगीत अपने अभिनव रूपों में यही अभिव्यक्ति पाता रहता है। लोक की अधिकांश अभिव्यक्तियां आज रागों का रूप ले चुकीं हैं। पं कुमार गन्धर्व ने तो लोकगीतों से शास्त्रीय संगीत का ऐसा संसार सजाया कि आज तक मानक बने हुए हैं । राजस्थान की मांड आज १५-१६ तरह की प्रचलित है,और संगीत में मांड राग बन गया है। इसी प्रकार अहीरी भैरव,अहीरों की रंगत थी जो आज रागों का रूप ले चुकी है। भटियार सरायों में रहने वालीं भटियारिनों की लोकरंगत थी जिसको गाकर वे यात्रियों को जगातीं थीं,जो संगीत में राग भटियार बन गया, अर्थात लोक रंगतें ही लोक से हटकर शास्त्रीय संगीत में राग नाम लेकर सहजवृत्ति का साधन बनी हुईं हैं। राग कलिंगडा, मारू,मारू विहाग,पहाड़ी,सिन्ध भैरवी,जोगिया,वैरागी, बंगाल भैरव,नट भैरव, आदि राग भी लोक से निकल कर संगीत में जाकर वह स्थान पा गये जिनको सीखने के लिए साधना करनी पड़ती है। कनउजी क्षेत्र की इतनी कर्ण प्रिय लोक धुनें हैं,जिनसे अद्भुत संसार का निर्माण होता है। कनउजी क्षेत्र में संगीत जीवी समाजों ने तो लोक और संगीत को प्राण- पण से सजाया है । यहां के कर्ण प्रिय दादरे,भजन, और अन्य लोकगीतों ने शास्त्रीय संगीत को अथाह कच्चा माल उपलब्ध करवाया है। इस क्षेत्र के संगीत जीवी समाजों में परम्परागत रूप से लोक संगीत को सहेजने वाले समाज,नट,बेड़िया,ब्रजवासी,कथक, राधा,नागर,हैं जिनके पास एक ओर शास्त्रीय संगीत की थाती तो दूसरी ओर लोकगीतों की विरासत है।इनके गांव तक इस क्षेत्र में हैं ,इसी प्रकार तिर्वा प्रखण्ड के अन्तर्गत आने वाला गांव बलपुरवा जो संसार के मानचित्र पर मशहूर हुआ,यहीं की पद्मश्री गुलाब बाई, जिन्होंने यहां के दादरों को सांगीत ( नौटंकी) के मंचों से क्या गाया? उनके दादरे ” नदी नारे न जाउ श्याम पैंया परूं”
“पान खाय सैंयां हमारो!” फिल्मों में भी गाए गये और हिट भी हुए। दुर्भाग्य यह है कि ऐसे समाजों को हम अन्त्यज मानकर हाशिए पर छोड़कर आगे बढ़ गये। इसी प्रकार पीलीभीत के उपनगर बीसलपुर की राधा रानी, और शान्तिबाई श्रीमती शकुन्तला देवी भी जानी- मानी सांगीत हीरोइनें है जिन्होंने कनउजी भाखा व लोक संगीत को जीवित रखा। आवश्यकता इस बात की है कि ऐसे समाजों की धरोहर को सहेजा जाना चाहिए,जिससे कनउजी लोक संगीत व कनउजी भाखा का संरक्षण हो सके।
डाॅ बीरेंद्र कुमार चन्द्रसखी
मैनपुरी
