सांगीत( नौटंकी) चाहे ब्रज की हो या कनउजी की हो उनमें शैलीगत अन्तर अधोलिखित पाएंगे।
१ हाथरस क्षेत्र की नौटंकी में खड़ी बोली के साथ उर्दू ( अरबी- फारसी) के शब्दों का आधिक्य है। कनउजी क्षेत्र की भाष कनउजी,उर्दू , ब्रजभाषा का मिश्रण है।इसमें कनउजी के लोकगीत( दादरे, विरह गीत,संस्कार गीत) आदि का मिश्रण होता है। वास्तविकता यह है कि कनउजी नौटंकी की भाषा बाजारू हहोती है।।
२- हाथरस क्षेत्र की नौटंकी स्वांग और भगत से अनुप्राणित है। जबकि कनउजी क्षेत्र में भगत बिल्कुल भिन्न अर्थ में प्रयोग की जाती है। कनउजी क्षेत्र में भगत देवी- देवताओं की उपासना के अर्थ में प्रयोग होती है। यहां पर इसे सुआंगु, तमाशा, नौटंकी नाम से पुकारते हैं।
३- कनउजी शैली की नौटंकी में दोहा,चौबोला,बहरतवील,लावनी, ग़ज़ल आदि छन्दों का ही प्रयोग होता है लेकिन अभिव्यक्ति और गायन का विशेष अन्तर है, ब्रज सांगीत स्वांग कहलाता है एवं इसका आलाप प्रधान रागों पर आधारित गायन होता है जबकि कनउजी सांगीत में गायन सपाट होता है आलाप नहीं होता है।यहां पर क्षेत्रीय रंगतों का प्रभाव अधिक होता है।
४- हाथरस क्षेत्र में हास्य व्यंग्य के लिए स्थूल श्रंगार किया जाता है। स्त्री पात्रों की भूमिका छरहरे लड़के ही करते हैं जबकि कनउजी में एक विशेष समाजों की लड़कियां और बहुएं स्त्री पात्रों की भूमिका होने से रोचकता और अभिनय में वास्तविकता सी आने लगती है। लेकिन इधर भौंडापन भी आने लगा फलस्वरूप अश्लीलता का बोलबाला हो गया। लेकिन स्त्री पात्रों की उपस्थिति के कारण मर्यादित भी रहना पड़ता है।
५- कनउजी क्षेत्र की नौटंकियों में भाव व्यंजकता/ श्रंगारिकता स्त्री पात्रों के आने से बढ़ी है। कलात्कमता की दृष्टि से कनउजी की नौटंकी श्रेष्ठ कहीं जा सकती है जबकि गायन हाथरस शैली का उत्कृष्ट है।
कनउजी क्षेत्र की प्रमुख सांगीत( नौटंकी) कम्पनियां:- इस क्षेत्र में सांगीत की देन तो हाथरस ही है,पं नथाराम शर्मा गौड़ की कम्पनी की अनुकृति पर यहां सांगीत कम्पनियां बनी,जिनमें सर्व प्रथम श्रीकृष्ण पहलवान ने कानपुर में अपनी कम्पनी बनाई। इसके बाद कन्नौज के तिरमोहन सिंह, मन्धना कानपुर के पं लालमन नंबरदार,( लम्बरदार) प्रमुख रहे । सन् १९३० में ठाकुर तिरमोहन सिंह की कम्पनी में गुलाब बाई , कृष्णाबाई जो बलपुरवा फर्रुखाबाद ( अब कन्नौज में) की संगीतजीवी समाजों से स्त्री कलाकारों के रूप में प्रविष्ट हुईं। गुलाब थियेट्रीकल सांगीत कम्पनी तो अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त है।इसका संचालन उनकी पुत्री श्रीमती मधु अग्रवाल कर रहीं हैं।
ठाकुर तिरमोहन सिंह की कम्पनी एवं श्रीकृष्ण पहलवान की कम्पनी अब अस्तित्व में नहीं हैं।मन्धना के लालमन दुबे की भी कम्पनी उनके बेटों श्री हरि शंकर दुबे व श्री जयशंकर दुबे चलाते रहें अब उनका भी अस्तित्व नहीं है।नम्बरदार की कम्पनियों के अतिरिक्त कानपुर कीसांगीत कृष्णा कम्पनी,बुलाकी सांगीत कम्पनी,मुन्नी सांगीत कम्पनी,सफी सांगीत कम्पनी,राम सिंह सांगीत कम्पनी,भार्गव सांगीत कम्पनी,रहीं हैं। फर्रुखाबाद के गुरु सहाय गंज की नीलम- संध्या की कम्पनी,मुन्नीलाल,सांगीत कम्पनी,पट्टियां के रामस्वरूप सांगीत कम्पनी,कन्नौज के राधेश्याम की कम्पनी,माधौनगर के यदुनाथ की, फर्रुखाबाद के नत्थूलाला की सांगीत कम्पनी अपने समय की मशहूर कम्पनियां रही हैं। पीलीभीत जनपद के बीसलपुर कस्बे की गुलाब बाई के समकक्ष राधारानी की तथा शान्तिबाई के सांगीत कम्पनी,जहांगीर की थियेट्रिकल कम्पनी, बदांयू की नत्थूसिंह सांगीत कम्पनी प्रसिद्ध रहीं हैं।बीसलपुर तो किसी समय में सांगीत कम्पनियों का केन्द्र रहा है। लेखक ने श्रीमती राधारानी का विस्तृत साक्षात्कार लिया था जो अभी भी अन्तर जानें पर है।
अब इन कम्पनियों का कोई अस्तित्व नहीं है। इधर कानपुर के रम्पत सलामी की कम्पनी ने अश्लीलता के घोड़े को दौड़ा – दौड़ा कर लोगों के मनस् को विकृत किया व सांगीत कम्पनियों को बदनाम भी किया है।
आधुनिक समय में दी ग्रेट सांगीत कम्पनी इटावा जो इटावा की शादी लाल की धर्मशाला और साबितगंज से संचालित होती हैं।इसका संचालन श्री इंद्रमोहन यादव जी करते हैं। दी ग्रेट सांगीत कम्पनी आप सराय अगहत की है जिसका संचालन भूरेलाल कठेरिया, करते हैं। इसके साथ ही दी ग्रेट सरन सांगीत कम्पनी कानपुर,चंचला थियेट्रिकल कम्पनी,दी ग्रेट पूनम नौटंकी इटावा (श्री इंद्रमोहन यादव) गीता सांगीत कम्पनी पीलीभीत आदि संचालित हो रहीं हैं।
आजकल महानगरों में भी इनके प्रदर्शन हो रहे हैं जिसे नयी पीढ़ी पसन्द भी कर रही है। विश्वविद्यालयों में शोधकार्य भी हो रहा है।यह बहुत रचनात्मक तथ्य है कि आज की नयी पीढ़ी इस सांस्कृतिक विरासत को सहेज कर अभिलेखीकरण करके अगली पीढ़ी तक पहुंचाने का कार्य कर रही है।
समस्त स्रोत मेरी पुस्तक “सांगीत के विविध आयाम” पर आधारित हैं।
डाॅ बीरेंद्र कुमार चन्द्रसखी
९२०५४६०२६४.
