आखर-आखर कन्नौजी

 

शुक्रवार- लोकनाट्य,बाल नाट्यों तथा नकटौरा आदि के कार्य दिवस पर पटल संचालक डॉ बीरेन्द्र कुमार चन्द्रसखी जी ने सांगीत नौटंकी के पुरोधा द्वय श्रीकृष्ण पहलवान,(कानपुर)पं नंथाराम शर्मा गौड़ और‌ प्रसिद्ध नौटंकी कलाकार पद्मश्री गुलाब बाई का उल्लेख करते हुए स्वरचित दोहा-चौबोला प्रस्तुत कर पटल पर अपनी प्रस्तुति हेतु साहित्यकारों का आह्वान किया।
दोहा-
कन्नौजी के वीर हइं, करइं अनोखे काम।
मेहन्त्ति कत्त हईं चूरिके,अउर लेत हरि नाम।।
चौबोला-
अउर लेत हरि नाम,जउं पुरिखन‌ नेईं हमहि सिखाओ।
रोपा करइं बस्सात धान,यहीं जा घर मइं आओ।।
गेहूॅं,मटर, बाजरा,चटरा-मटरा खूब कमाओ।
खूंड़ चूसकइं भइया देखउ,दिन भर हर हूं चलाओ।।
इसके पश्चात प्रथम प्रस्तुति के रूप में डा एन०सी० द्विवेदी जी ने अपना लोकगीत-
मेरे दूल्हा मेरी गुइयाॅं,
मोकों जे सेण्डल लै आए।
मेरी चप्पल टूटि गई थी,
सो नाउं जुड़वाए।।
प्रस्तुत कर पटल को गतिमान बनाए रखा।इसके बाद‌ द्विवेदी जी ने एक अन्य लोकगीत-
अकिल्ली डरु लागै,राति मेरी अम्मा को प्रस्तुत कर सुप्रसिद्ध नौटंकी कलाकार गुलाबबाई द्वारा गाए गए लोकगीत-
रात मोरी अम्मा अकेली डर लागै का स्मरण करा दिया। इसी लोकगीत की कुछ पंक्तियों को डॉ चन्द्रसखी जी ने हारमोनियम पर सस्वर गाकर समां बाॅंध दिया।
शनिवार- लोकगीत दिवस के अंतर्गत-
श्री एन०सी०द्विवेदी जी ने गृह स्वामी की दैनिक स्थिति को दर्शाता लोकगीत प्रस्तुत किया-
एक दिना की बात बताबैं दउआ उठे भुरारैं।
बैठे जाइ खरखरी खटिया मुॅंह लकटायॅं दुआरैं।।
इसके बाद अपूर्वा अवस्थी जी ने शीत के मौसम में कई दिन से अदृश्य सूरज के निकलने पर जन-जन की प्रसन्नता के भाव व्यक्त करते हुए कहा-
निकरि परो सूज्ज सबै नीको लगो।
भाजि गओ कोहिरा गगन खूब चमकै।
डॉ प्रखर दीक्षित जी ने जाड़े के मौसम में अगिआहने बैठे ग्राम्य जनों के परस्पर संवाद की बड़ी ही रोचक अभिव्यक्ति की है।
“अंगियाने हैं बब्बा बइठे मस्काबैं भुन्नाबैं।
अपुनी-अपुनी तानैं सबरे बात कोई नयं मानैं।।
सोमवार-बतकही के अंतर्गत डॉ बीरेन्द्र कुमार चन्द्रसखी जी ने सियार और लोमड़ी की मित्रता पर केन्द्रित कहानी का‌ विषय देकर पटल के रचनाकारों को अपनी-अपनी रचनाओं के साथ आमंत्रित किया।इस पर डॉ महेश मधुकर ने सिरकटा अउर लुमड़िया,तथा श्री एन०सी०द्विवेदी ने एक हुतो सियट्टा शीर्षक कहानी प्रस्तुत की।अपूर्वा अवस्थी व डॉ प्रखर दीक्षित जी ने भी मनोरंजक तथा रोचक कहानियाॅं प्रस्तुत कर पटल को गतिमान बनाए रखा।
डॉ चन्द्रसखी जी ने शुक्रवार से सोमवार तक पटल पर प्रस्तुत रचनाओं की सुंदर तथा सारगर्भित समीक्षा की तथि रचनाकारों का उचित मार्गदर्शन कर प्रोत्साहित भी किया।

 

———————