उत्तर भारतीय लोकनाट्यों में सांगीत (नौटंकी) एक ऐसा लोकनाट्य है जिसमें कलाकारों के द्वारा प्रत्यक्ष प्रदर्शन करके श्रोताओं दर्शकों को मनचाहे मन:स्थिति में लाया जा सकता है। संगीत में कुछ ऐसे समाज और समाज के लोग प्रदर्शन करते थे जो परंपरागत लोकनाट्यो से जुड़े होते थे इससे पूर्व उनकी परंपरा संगीत की पृष्ठभूमि की थी , जहां भी वे प्रदर्शन करते वहीं पर देशभक्ति और देश प्रेम से युक्त गाने गाकर जन समाज दर्शकों और श्रोताओं के मन को बदलने में अपनी कला का सहारा लेते थे । उन कलाकारों में सर्वप्रथम अज़ीज़ान उर्फ अंजुला का नाम आता है जिसने अपने नृत्य और संगीत के द्वारा अंग्रेजों की ऐसी खबर ली जिसकी तुलना करना बहुत कठिन है। सन् 1857 में जो विद्रोह हुआ उसमें अज़ीज़ान की भूमिका को नकारा नहीं जा सकता है जिसने अंग्रेजों के खेमों में जाकर अंग्रेजों की गतिविधियों को स्वतंत्रता सेनानियों तक पहुंचा कर इस विद्रोह को गति प्रदान की उसने अपनी मस्तानी सेना ‘ग्रीन ब्रिगेड’ का गठन करके तत्कालीन कानपुर के अधिकारी हैवलॉक की नाको में नकेल कल डाल दी थी। कानपुर एक ऐसा नगर है जो लावन बाजों और खयाल बाजों के लिए प्रसिद्ध था। प्रताप नारायण मिश्र जैसे प्रभृति विद्वान लावनी जैसी शैली को अपनी रचनाओं का माध्यम बनाया साथ ही साथ तत्कालीन अंग्रेजी हुकूमत के विरुद्ध बिगुल बजाने में भी पीछे नहीं रहे। जहां तक कानपुर शैली की नौटंकी का प्रश्न है तो यह कहना समीचीन होगा कि पूर्वांचल में भी देश प्रेम और देशभक्ति का माध्यम बना इसका मुख्य कारण यह है कि गणेश शंकर विद्यार्थी जी के संपर्क में रहने के कारण कानपुर शैली नौटंकी के पितामह श्री कृष्ण पहलवान का नाम स्वर्ण अक्षरों में आता है जिसमें उनके द्वारा रची गई नौटंकी और उनका मंचन होने के कारण जनता में देशभक्ति की लहर दौड़ने लगी साथ ही साथ लगन और भावना का विकास हुआ जिसके कारण जनता और भारतीय जनमानस स्वतंत्रता के लिए छटपटाने लगे। हाथरस के पंडित नथाराम शर्मा गौड़ जो ब्रज संगीत के गंधर्व कहे जाते हैं उन्होंने कानपुर में जाकर अपने संगीतों का प्रदर्शन किया उसको देखकर कानपुर के श्री कृष्णा मेहरोत्रा उर्फ श्री कृष्ण पहलवान ने अपनी नौटंकी कंपनी बनाई जिसमें उन्होंने सबसे पहले हकीकत राय पर लिखित नौटंकी का प्रदर्शन किया क्योंकि श्री कृष्ण पहलवान आर्य समाज के सिद्धांतों का पालन करते थे इसलिए उनके रक्त में देशभक्ति और देश प्रेम रचा बसा था 1920-21 में असहयोग आंदोलन प्रारंभ होने पर श्री कृष्ण पहलवान ने ‘असहयोग चटनी’ की रचना करके गांव और नगरों में नौटंकी का प्रदर्शन किया जिससे ग्रामीण जनता में असहयोग आंदोलन की के प्रति जागरूकता पैदा हुई सन 1926 में खून-ए-नाहक उर्फ जलियांवाला बाग हत्याकांड जो उस हत्याकांड के प्रतिरोध स्वरुप लिखा गया था उसका प्रदर्शन बिजनौर व कानपुर नगरों में किया गया। जब ब्रिटिश तानाशाही की नजर इन पर पड़ी तो प्रतिक्रिया स्वरूप ब्रिटिश शासन की भौंहे तनने लगी। श्री गणेश शंकर विद्यार्थी ने श्री कृष्ण पहलवान को उपर्युक्त संगीत के प्रचार प्रसार में मदद की,’आंख का जादू संगीत और उसका एक गाना इतना प्रसिद्ध हुआ कि लोग उसको गा गा कर सड़कों व गलियों में से गुजरते थे। यह गाना ‘अब काबू में है दिल हमारा नहीं,मुझे इसकी जुदाई गंवारा नहीं’बरेली के लोगों में इतना छा गया कि तत्कालीन अंग्रेज कलेक्टर ने श्री कृष्ण पहलवान को 24 घंटे के अंदर बरेली छोड़ने का फरमान जारी कर दिया इसके साथ ही कानपुर के मंधाना के लालमन द्विवेदी उर्फ लंबरदार की संगीत कंपनी जब प्रदर्शन करती तो व्यंग्योक्ति और चुटीली शैली के गानों को नौटंकी मंचों से सार्वजनिक प्रदर्शन करके जनमानस को स्वतंत्रता आंदोलन के लिए तैयार कर देते थे। लालमन दुबे नौटंकी मंचों से रंगपूर्व(रंगा) में जो गाना गाते थे उसे सुनकर भारतीय जनता में वीर रस का संचार होता था। जब बिगड़ ये हिंद वाले जायेंगे,फिर संभाले न संभाले जायेंगे जैसे गानों को जन सामान्य गुनगुनाता था। नौटंकी मंच स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के लिए ऐसा मंच बन गया जिससे जिससे स्वतंत्रता संग्राम सेनानी अपने संदेशों को आम जनमानस तक सरलता से पहुंचाते थे।जब अंग्रेजी हुकूमत को यह जानकारी हुई तो तत्काल प्रभाव से नौटंकी प्रदर्शनों पर पाबन्दी लगा दी। यह पाबन्दी आज तक स्वतंत्र भारत में लागू है। लालमन उर्फ लम्बरदार ” ए! पीने वाले देश का प्याला उठा के पी। भगत सिंह की तरह अपनी जवानी लुटा के पी।” गाते थे तो नौजवानों का खून खौलने लगता था। इन सब गतिविधियों से अंग्रेजी सरकार की बूंदें हिलने लगीं। इससे भी सांगीत प्रदर्शनों पर रोक लगाने पर विवश हुई।
ब्रज सांगीत ने भी स्वतंत्रता आंदोलन में अपना अभूतपूर्व योगदान दिया। यहां के सांगीत रचनाकारों ने भी अलग- अलग तरह से देशप्रेम और देशभक्ति से युक्त सांगीतों की रचना की इसमें पं नथाराम शर्मा गौड़ ने सांगीत गरीब हिन्दुस्तान ऐसी रचना है जिसके प्रदर्शनों पर रोक तो नहीं लगी परन्तु कुछ फुटकर रचनाओं पर रोक अवश्य लगी। उन्हें चेतावनी देकर छोड़ दिया गया। पं नथाराम शर्मा गौड़ ने सांगीत अमर सिंह राठौर में महारानी एलिजाबेथ की झूठी प्रशंसा में अंग्रेजी में चौबोला लिखकर अंग्रेजी शासन को प्रसन्न करने की कोशिश की परन्तु ऐसा नहीं हो सका। अपनी रचनाओं पर रोक के बावजूद वे देशभक्ति से युक्त रचनाओं को रचकर आम जनता तक प्रदर्शनों के माध्यम से पहुंचाते रहे और स्वतन्त्रता आन्दोलन की पृष्ठभूमि तैयार करते रहे।सांगीत गरीब हिन्दुस्तान की भाषा और शैली इस प्रकार की थी कि अंग्रेज़ों के समझ में नहीं आती थी।
उदाहरण के लिए –
कमर ली कसके सत्यानाशने अतिअत्याचारों पर।
बड़े ही जुल्म ढाये हिंद राजा के दुलारो पर।।
कसर बाकी नहीं छोड़ी रिआया के सताने में।
हजारों को कराया बंद जालिम जेल खाने में।।
इसके अतिरिक्त पंडित नथाराम शर्मा गौड़ ने स्वतंत्रता की प्राप्ति के लिए आसान्वित होते हुए एक गाना सांगीत के मंचों से गाया जो कांग्रेसी कार्यकर्ताओं को बहुत पसंद आता था-
प्यारे हिंदोस्तां अब न दिलगीर हो,तुझको भारी सहारा लगाऊंगी मैं ।
गर जवाहर की जय बोलता तू रहा तौ तुझै पूरा मुखिया बनाऊंगी मैं।।
सांगीत गरीब हिंदुस्तान 1937 में प्रकाशित हुआ जिसको सांगीत कंपनी ने हाथों हाथ लेकर प्रदर्शन किये और जनता में देश प्रेम का संचार किया। हाथरस से ही उस्ताद शिव शंकर द्वारा रचित संगीत बाग-ए-जलियान 1923 में प्रकाशित हुआ जिसका संदेश जनता में सकारात्मक गया इसमें अंग्रेज अफसर के द्वारा भारतीय जनता को और उसकी एकता का सटीक वर्णन किया है-
न माने खौफ दिल रिआया बड़ा उधम उठाया है,
मिले हैं हिंदू और मुस्लिम क्या सत्याग्रह चलाया है ।
हमारी दाल है इस हाल में मुतलक न गलने की ,
न अंग्रेजों का दिल अंदर जरा भी खौफ खाया है।।
इसी कड़ी में सन 1921 में पंजाब का हत्याकांड रतन लाल जमर्रुद सिकंदराबाद वालों ने पंजाब का हत्याकांड प्रकाशित कराया जिसमें जलियांवाला बाग के बारे में अंग्रेजों के द्वारा निर्दोष लोगों का मारा जाना बहुत चिंता का विषय बना लेकिन सांगीतकार ने इस प्रकार से अपना संदेश दिया कि व्यक्ति निराशा से आशा की ओर अग्रसर होने लगा। यथा-
आज मुझको हुआ है यह पूरा यकीन अब बने मुल्क आजाद हिंदुस्तां।
देवियों ने उठा है यह बीड़ा लिया जालिमों का मिटा देंगी नाम ओ निशां।।
खिदमत ए कौम में तुम बढ़ाओ कदम यह ही खुशकिस्मती मुल्क की है अयां।
आपके आह व नाला दूर दृष्टि से कांपता है यह सारे का सारा जहां।
उस समय इन समस्त सांगीत कृतियों पर प्रतिबन्ध लगा दिया था,एवं प्रदर्शनों पर भी प्रदर्शनों पर प्रतिबन्ध लगाया।
आज भी सांगीत( नौटंकी) के कलाकार अपने प्रदर्शनों में अन्त ( भरतवाक्य) में ओज और शौर्य से युक्त गीत गाकर नयी पीढ़ी में देशप्रेम की भावनाओं का विकास कर रहे हैं।
देखो देखो भारत माता करती रही पुकार थे।
नौजवान जाग रे! नौ जवान जाग रे!
अदू लगाते आकर देखो आग रे! नौजवान।
डाॅ बीरेंद्र कुमार चन्द्रसखी
मयनपुरी ( मैनपुरी) उ प्र
२०५००१
९२०५४६०२६४
