कनउजी लोक साहित्य एवं भाषा विज्ञान एक विश्लेषण


किसी भी लोक साहित्य की जाती क्षेत्र की विभिन्न बोलियों में होती है। क्षेत्रीय लोक साहित्य परिवर्द्धन और‌ परिवर्तन के साथ-साथ क्षेत्रीय भाषाओं का उपयोग करते करते चलता रहता है।कनउजी लोक साहित्य भी इस प्रक्रिया से अछूता नहीं है।यदि हमें विभिन्न कालों के कनउजी लोक साहित्य संग्रहीत उपलब्ध हो जाएं तो हम तुलनात्मक अध्ययन के आधार पर भाषा में होने वाले परिवर्तनों का सहज ही पता लगा सकते हैं। ऐसा भी देखा गया है कि शिष्ट जन समुदाय को भी अपने स्वार्थ वश लोक के सम्पर्क में आना पड़ता है। यह सम्पर्क भाषा के माध्यम से सहज और सरलता पूर्वक हो जाता है।अत:भाषा विज्ञान के अन्तर्गत लोक भाषाओं ( कनउजी बोली) का भाषा वैज्ञानिक अध्ययन अपेक्षित हो जाता है।इन कनउजी की उपबोलियों का भाषा वैज्ञानिक अध्ययन अपेक्षित और सम्भव हो पाता है।
भाषा वैज्ञानिकों ने लोक साहित्य के आधार पर ही विभिन्न बोलियों/ उपबोलियों का अध्ययन लोक साहित्य के आधार पर किया है। इनके लिए कनउजी लोक साहित्य भी प्रयोगशाला के विभिन्न उपकरणों का कार्य करता है।अब भाषा विज्ञान भी अपने क्षेत्र को व्यापक बनाता हुआ साहित्यिक एवं सांस्कृतिक अध्ययनों में प्रवृत्त हों रहा है। भाषा विज्ञान के बहुत सारे सिद्धांत लोक- भाषाओं ( बोलियों) के अध्ययन से आ सके हैं। कोई भी भाषा वैज्ञानिक लोक साहित्य की पूर्ण उपेक्षा नहीं कर सकता है। कनउजी की उपबोलियों का अध्ययन इस आधार पर किया  गया है। इसकी क्षेत्रीयता के आधार व बलाघात के आधार पर विभाजन किया गया है। जैसे बांगर क्षेत्र की बोली का नामकरण उसके बलाघात और क्षेत्र के हिसाब से इस क्षेत्र की बोली का नाम “बंग्रही ”  रखा गया। मैंनपुरी अन्तर्वेद के क्षेत्र में आती है तो इसका नाम अन्तर्वेदीय  रखा गया है। इसी प्रकार शाहजहांपुरिया, पीलीभीती,  तिरहारी, बदउआं ,आदि उपबोलियां हैं।  इन बोलियों को उनके स्वनिम सिद्धांत के आधार पर  विभाजित किया गया है। कनउजी की उप बोलियों का भाषा वैज्ञानिक अध्ययन करने पर आश्चर्यजनक तथ्य निकल कर आते हैं। जैसे कौन को  कउंन ,यह  को जहि, जउ, जू आदि क्षेत्रीयता के आधार पर बोला जाता है।कनउजी में  भाषा विज्ञान के सिद्धांत जैसे मुख- सुख, अल्पत्व – बहुत्व,घोष- अघोष जैसे भी सुनने को मिल जाते हैं। एक विशेष बात भी उल्लेखनीय है कि यह बलाघात विभिन्न समाजों के आधार पर भी बदलता है। कनउजी क्षेत्र में कुछ समाज  बाल्टी को बांटी  कल्सिया को कन्सिया बोलते सुने गये हैं। यह अनुनासीकरण कहलाता है। अतः कनउजी भाषा का भाषा विज्ञान बहुत आनन्ददायक भी है, मनोरंजन से भरपूर भी है।
डाॅ बीरेंद्र कुमार चन्द्रसखी
मैनपुरी उ प्र
२०५००१ 

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